परवीन शाकिर शायरी दर्द की खुली किताब | Parveen Shakir Poetry - Open Book of Pain | Urdu Hindi

परवीन शाकिर शायरी - दर्द की खुली किताब | Parveen Shakir Poetry - Open Book of Pain | Urdu Hindi

परवीन शाकिर शायरी - दर्द की खुली किताब | Parveen Shakir Poetry - Open Book of Pain | Urdu Hindi


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 परवीन शाकिर

एक ऐसी शायरा जिसने ज़िंदगी को हमेशा किसी कश्मकश की बजाय

जीत-हार के किनारों में ख़त्म करना ही बेहतर समझा।

परवीन शाकिर पाकिस्तान की उन मक़बूल शायराओं में शुमार हैं

जिनकी शायरी ना सिर्फ ख़वातीनो के

बल्कि हर उस अदब नवाज़ के दिल पर दस्तक देती हैं

जो मोहतरमा परवीन शाकिर को जानता हैं।

परवीन शाकिर साहिबा ने अपने कलाम में

मोहब्बत को आसमान की तरह फैला दिया है

और ख़फा, जफा और वफा

जैसे लफ्ज़ो के साथ अपने अलफाजों में उतारा है।

आज पेशे खिदमत है,

मोहतरमा परवीन शाकिर के शायराना गुलशन से कुछ चुनिंदा काँटों भरे फूल।

आइये मुलायज़ा फरमाये...

अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं

अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई

परवीन शाकिर साहिबा के कलाम में खुली आंखों से

ख़्वाब देखने का जज्बा भी है, और जद्दोजहद की आग में

जल रहे दर्द को हमदर्दी की बारिश से सर्द करने की कोशिश भी करती हैं।

अर्ज़ किया है

जिस तरह ख़्वाब मेरे हो गए रेज़ा रेज़ा

उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई

उनकी नज़म और ग़ज़ल इश्क के ज़ख़्म को भी नया मान बैठती है।

ज़िंदगी की ख्वाहिशों को तन्हाई में भी जिंदा रखने की कोशिश

आपको दूसरे शायरों से जुदा करती है।

इन्ही खासियत की वजह से मैं परवीन शाकिर साहिबा  का मुरीद हूं।

तवज्जो चाहुँगा…

अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं

रोज़ इक मौत नए तर्ज़ की ईजाद करे

कमोबेश, अपने हर कलाम में उन्होंने ख़वातीन के दिल के

नाज़ुक रुख़ को बेहद नफासत और खूबसूरती से सामईन के सामने रखा।

जज्बात चाहे एक मां के हो, या एक सादा लड़की के

या हिज्र में तड़पती एक माशूक़ा के।

तवज्जो दीजिएगा…

बस ये हुआ कि उस ने तकल्लुफ़ से बात की

और हम ने रोते रोते दुपट्टे भिगो लिए

मोहतरमा परवीन शाकिर साहिबा ने अपनी बात

जिस बेबाकी से रखी वही उनकी खासियत बनी।

आइये मुलायज़ा फरमाये...

हम तो समझे थे कि इक ज़ख़्म है भर जाएगा

क्या ख़बर थी कि रग-ए-जाँ में उतर जाएगा

मोहतरमा परवीन शाकिर की शायरी की खासियत यही है

कि “दीवारे-अना” को तोड़कर उनके जज्बातों की बाढ़

पढ़ने वाले मर्दाना मुआशिरे को डुबोती ही नहीं,

बल्कि अपनी गहराई में सराबोर भी कर देती है

और ये कह उठती है…

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने

बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की

गौर-तलब है, कि जिस मुआशिरे में ख़वातीनो के जज़्बात

खालिस मर्द के कलम में लगी आंखों के मोहताज रहे हो

वहां इस तरह बेबाक कलम चलाना अपने आप में वाकई बड़ी हिम्मत की बात हैं।

पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है

फैलता जाता है फिर आँख के काजल की तरह

परवीन शाकिर साहिबा लबरेज़ हो चुके पैमाने को भी

छलकाने के लिए तैयार रहती हैं।

वो अपनी तबाही का मंजर किसी की आंखों के सामने रखती है

और उसका हिसाब मांगने से भी गुरेज़ नहीं करती ।

ग़ौर फरमाये…

शाम होने को है और आँख में इक ख़्वाब नहीं

कोई इस घर में नहीं रौशनी करने वाला

मोहतरमा परवीन शाकिर ने अपने कलाम में दर्द-ए-इश्क़ के अलावा

मुल्क, मुआशिरा, और गिरदोपेश को भी ख़ुसूसी जगह दी।

ज़िंदगी के नशेबो-फराज़ को अपने कलाम में इतनी खूबसूरती से

सामईन के सामने पेश किया है,

कि किसी भी हालात में ज़िंदगी का दामन

उन के हाथ से छूटता हुआ महसूस नहीं होता।

काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा

अपने सुकून के कातिलों को भी दुआओ से नवाज़ने वाली

इस शायरा के इस शेर में आप गौर कीजिये,

कि किस तरह से परवीन शाकिर ने

दर्द और दुआओ को विसाल के लिए तैय्यार किया है।

तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे

तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की

मोहतरमा परवीन शाकिर इश्क़ के अंजाम से

आशना हो कर भी बे-सदा नहीं रहीं।

बे-शमशीर-ओ-सिनां  इंतक़ाम लेने का अंदाज़

परवीन शाकिर बख़ूबी जानती हैं जो उनके कलाम में

वाज़ेह तौर पर झलकता हैं।

बदन के कर्ब को वो भी समझ न पाएगा

मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी

मोहतरमा परवीन शाकिर मोहबत में

टूटी और बिखरी हुई मगर एक बेहद खुद्दार ख़ातून थी।

उनकी ये घुटन उनके शेरो में वाज़ेह तौर पर दिखाई देती है।

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा

इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा

तमन्ना तो ये है के मोहतरमा परवीन शाकिर के आशार पढ़ता ही जाऊ

मगर वक़्त की कमी का तकाजा तमन्ना पे भारी है

वरना परवीन शाकिर साहिबा को चंद लम्हो के वीडियो में

पेश करना उन की शख्सियत के साथ नाइंसाफी है।

हक़ीक़तन इस वीडियो का असल मक़सद तो ये है

कि कुछ एक चंद आशार सुनने के बाद,

आप का दिल भी मोहतरमा परवीन शाकिर को पढ़ने की आरज़ू करे।

जिस दिन परवीन शाकिर को सुपुर्दे ख़ाक किया गया,

उस रात बहुत बारिश हुई,

ऐसा लगा के आसमान भी रो पड़ा हो, और ये सवाल पूछ रहा हो…

कोई सवाल जो पूछे तो क्या कहूँ उससे

बिछड़ने वाले सबब तो बता जुदाई का

सैयद शाकिर के घराने का ये रौशन चराग़

इस्लामाबाद के कब्रिस्तान की ख़ाक में मिल तो गया लेकिन

उनकी खुशबू अदब की विरासत को

रहती दुनिया तक मोअत्तर करती रहेगी।

मैं उन को अपनी मोहबतो और अक़ीदतो का सलाम पेश करता हूँ।

आखिर में हमारी आपसे ये अदना सी इल्तेज़ा हैं

कि आप ज्यादा से ज्यादा इस वीडियो को लाइक और शेयर करके

हमारी भी हौसला अफ़ज़ाई फरमाये

और चैनल को सब्सक्राइब करके अपने प्यार का मुज़ाहिरा करे।

शुक्रिआ, दुआओ में याद रखियेगा ।

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