Motivation thought in Hindi | हिंदी की प्रेरणादायक कहानी| बुद्धिमान साधु

Motivation thought in Hindi |  हिंदी की प्रेरणादायक कहानी| बुद्धिमान साधु

Motivation thought in Hindi |  हिंदी की प्रेरणादायक कहानी| बुद्धिमान साधु


             *!! बुद्धिमान साधु !!*

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


एक साधु घने जंगल से होकर जा रहा था। उसे अचानक सामने से बाघ आता हुआ दिखाई दिया। साधु ने सोचा कि अब तो उसके प्राण नहीं बचेंगे। यह बाघ निश्चय ही उसे खा जाएगा। साधु भय के मारे काँपने लगा। फिर उसने सोचा कि मरना तो है ही, क्यों न बचने का कुछ उपाय करके देखें।


साधु ने बाघ के पास आते ही ताली बजा-बजाकर नाचना शुरू कर दिया। बाघ को यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोला- “ओ रे मूर्ख! क्यों नाच रहे हो? क्या तुम्हें नहीं पता कि मैं तुम्हें कुछ ही देर में खा डालूंगा।”


साधु ने कहा- “हे बाघ, मैं प्रतिदिन बाघ का भोजन करता हूं। मेरी झोली में एक बाघ तो पहले से ही है किंतु वह मेरे लिए अपर्याप्त है। मुझे एक और बाघ चाहिए था। मैं उसी की खोज में जंगल में आया था। तुम अपने आप मेरे पास आ गए हो, इसीलिए मुझे खुशी हो रही है।”


साधु की बात सुन कर बाघ मन-ही-मन कुछ डरा। फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने साधु से कहा- “तुम अपनी झोली वाला बाघ मुझे दिखाओ। यदि नहीं दिखा सके तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।”


साधु ने उत्तर दिया- “ठीक है, अभी दिखाता हूँ। तुम जरा ठहरो, देखो भाग मत जाना।”


इतना कहकर साधु ने अपनी झोली उठाई। उसकी झोली में एक शीशा था। उसने शीशे को झोली के मुख के पास लाकर बाघ से कहा- “देखो, यह रहा पहला वाला बाघ।”


बाघ साधु के पास आया। उसने जैसे ही झोली के मुंह पर देखा, उसे शीशे में अपनी ही परछाई दिखाई दी। इसके बाद वह गुर्राया तो शीशे वाला बाघ भी गुर्राता दिखाई दिया। अब बाघ को विश्वास हो गया कि साधु की झोली में सचमुच एक बाघ बंद है। उसने सोचा कि यहाँ से भाग जाने में ही कुशल है। वह पूँछ दबाकर साधु के पास से भाग गया।


वह अपने साथियों के पास पहुँचा और सब मिल कर अपने राजा के पास गए। राजा ने जब सारी घटना सुनी तो उसे बहुत क्रोध आया। वह बोला- “तुम सब कायर हो। कहीं आदमी भी बाघ को खा सकता है। चलो, मैं उस साधु को मजा चखाता हूं।”


बाघ का सरदार दूसरे बाघों के साथ साधु को खोजने चल पड़ा। इसी बीच साधु के पास एक लकड़हारा आ गया था। साधु उसे बाघ वाली घटना सुना रहा था। तभी बाघों का सरदार वहाँ पहुँचा। जब लकड़हारे ने बहुत से बाघों को अपनी ओर आते देखा तो डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गई। वह कुल्हाड़ी फेंक कर पेड़ पर चढ़ गया। साधु को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। वह पेड़ के पीछे छिप कर बैठ गया।


जो बाघ साधु के पास से जान बचा कर भागा था, वह अपने सरदार से बोला, देखो सरदार सामने देखो, पहले तो एक ही साधु था, अब दूसरा भी आ गया है। एक नीचे छिप गया है और दूसरा पेड़ के ऊपर, चलो भाग चलें।”


बाघों का सरदार बोला, “मैं इनसे नहीं डरता। तुम सब लोग इस पेड़ को चारों तरफ से घेर लो, ताकि ये दोनों भाग न जाएं। मैं पेड़ के पास जाता हूं।”


इतना कह कर बाघों का सरदार पेड़ की तरफ बढ़ने लगा। साधु और लकड़हारा अपनी-अपनी जान की खैर मनाने लगे। अचानक लकड़हारे को एक चींटी ने काट खाया। जैसे ही वह दर्द से तिलमिलाया कि उसके हाथ से टहनी छूट गई। वह घने पत्तों और टहनियों से रगड़ खाता हुआ धड़ाम से नीचे आ गिरा। जब साधु ने उसे गिरते हुए देखा तो वह बहुत जोर से चिल्लाया, “बाघ के सरदार को पकड़ लो। जल्दी करो, फिर यह भाग जाएगा।”


धड़ाम की आवाज और साधु के चिल्लाने से बाघों का सरदार डर गया। उसने सोचा कि यह साधु सचमुच ही बाघों को खाने वाला है। वह उलटे पैरों भागने लगा। उसके साथी भी उसे भागता हुआ देखते ही सिर पर पैर रखकर भाग गए।


*सदैव प्रसन्न रहिये।*

*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*

✍️*💐💐"प्रेम से भरी ओढ़नी"💐💐*

वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी। दूध बेचकर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती। वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी। सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी-कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती फिर लौटकर अपने प्रभु की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल-गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती। कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।


एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवनक्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई। दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने दूध वापिस कर दिया। पंजीरी को खूब डाँटा, फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया।


पंजीरी पर तो आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची।


ठाकुर! मुझसे बड़ा अपराध हो गया। क्षमा करो! पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है? ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास पहुँची लेकिन प्रभु! तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की। प्रेम से दूध पीते रहे फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला और मुझे अधिक दु:ख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी-खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले! ठाकुर! यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी। यहीं प्राण त्याग दूंगी। 


भूखी-प्यासी, रोते-रोते शाम हो गई तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर आवाज़ सुनाई दी - माई ओ माई!


उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक सुदर्शन किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है।


कौन हो बेटा?


मैया! बृजवासी ही हूँ! मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने को मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा।


पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा! घर तुम्हारा है। ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया है। बड़ी दूर से आए हो क्या? क्या खाओगे? अभी जल्दी से बना दूँगी।


अरे मैया! इस समय क्या रसोई बनाओगी! थोड़ा सा दूध दे दो! वही पीकर सो जाउँगा।


दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं फिर अपने आपको सँभालते हुए बोली - बेटा! दूध तो है पर सवेरे का है। जरा ठहरो! अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ।


अरे! नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा-प्यासा हूँ।  दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है। अरे! वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना।


डबडबायी आँखों से बोली - थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है।


अरे मैया! तुम मुझे भूखा मारोगी क्या? जल्दी से दूध छानकर दे दो वरना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा।


पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है? दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया।


दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा।


मैया! कितना स्वादिष्ट दूध है! तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी। अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है। अब मैं सो रहा हूँ। इतना कहकर वो वहीं सो गया।


पंजीरी को फ़ुरसत हो गई तो दिन भर की थकान, दु:ख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया।


जाड़े के दिन थे! भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती? जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी।  दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।


ठाकुर जी बोले - मैया! मुझे भूखा मारेगी क्या? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी। स्वयं पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है। मैंने तो आज तुम्हारे घर आकर दूध पी लिया। अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख! मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ। मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना। गोसाईं भी अब तुम्हें कुछ ना कहेंगे! दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो!


पंजीरी हड़बड़ाकर उठी! देखा कि, बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था। सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदनमोहन को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।


थोड़ी देर में सवेरा हो गया। पंजीरी ने देखा कि, ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।


इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया कि, प्रभु! एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।


गोसाईं जी ने सोचा कि, प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।


लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोलीं - गुसाईं जी! देखो तो लाला को! पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये। कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था लेकिन भूखा-प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।


गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।


भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला? भक्तिबंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला? माई! मुझे क्षमा कर दो।


पंजीरी बोली - गुसाईं जी! देखी तुमने लाला की चतुराई! अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जान-बूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये। भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।


ठाकुर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे। 


अरे मैया! तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओढने में जो सुख है वो पीतांबर में कहां है

🚩🚩जय श्री कृष्ण 🚩🚩

Post a Comment

Previous Post Next Post